Tuesday, March 18, 2008

अगर यही विकास है तो.........


अभी सुबह के चार बजे हैं ...और मैं आधे घंटे तक मच्छरों से परेशान होकर.....परेशान क्या, हार कर उठ के बैठ गया हूं। हां, हां, पता है वो पचास रूपये वाली मशीन लगा लेनी थी.....लेकिन गर्मी भी तो अभी दो-तीन दिन से ही थोड़ी महसूस होने लगी है। आज पहली बार एक नंबर पर पंखा चला।

मैं एकदम निठल्ला बैठा हुया इस समय विकास की परिभाषा ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं..........मुझे नहीं याद कि बचपन में हम लोग कभी इन मच्छरों की वजह से उठे हों। अब इस तरह के घर में रहता हूं जिस में एक भी मक्खी नहीं है, ये कमबख्त मच्छर भी सुबह तो दिखते नहीं लेकिन शाम एवं रात के वक्त इन के द्वारा परेशान किया जाना बदस्तूर जारी है। घर के आसपास भी ...लगभग आधे किलोमीटर तक ...गंदगी कहीं भी नज़र नहीं आती।

हम लोग इतने दशकों से सुनते आ रहे हैं ना कि मच्छरों को रोकथाम के लिये फलां-फलां कदम हमें उठाने चाहियें ....और हर बंदा अपने सामर्थ्य के अनुसार इस दिशा में कुछ न कुछ कर के खुश होता भी रहता है। लेकिन फिर भी इन बीमारियों की खान.....मच्छरों को हम लोग मिलजुल कर कंट्रोल नहीं कर पाये.......और बातें हम लोग इतनी बड़ी बड़ी हांकेंगे कि जैसे पता नहीं .............यकीन नहीं हो तो ट्रेन के सामान्य डिब्बे में हो रही गर्मागर्म डिस्कशन में थोड़ा सम्मिलित हो कर देख लीजियेगा। किसी कंपार्टमैंट में तो एक ग्रुप के माडरेटर को यही चिंता सताये जा रही है कि पाकिस्तान का क्या बनेगा....तो दूसरा, यह सोच कर दुःखी है कि इस बार उस का मनपसंदीदा चैनल सब से तेज़ चैनल न बन पाया.........!!

और हां, पहले इन दिनों में ही आंगन में तो नहीं ,लेकिन बरामदे में सोने की तैयारियां शुरू हो जाया करती थीं। और अब बच्चों को तारों से भरे अंबर के तले सोना भी किसी परी-कथा जैसा लगता है...............कोई सो कर तो देखे...या तो मच्छर ही अगवा कर के ले जायेंगे ....और अगर कहीं अगवा होने से बच गया तो सुबह इन के द्वारा काटे हुये के निशान देख देख कर तुरंत मच्छर-मार या मच्छर भगाऊ मशीन को लेने दौड़ पड़ता है।

जो भी हो......जैसा कि सब जगह ही कहते हैं कि इन बदले हुये हालातों के लिये हम सब ज़िम्मेदार हैं.................मुझे सब से ज़्यादा दुःख इसी बात का है कि हम सारा दिन गंदगी को रोना रोते रहते हैं ...............साफ ढंग से नहीं हो पा रही है, सफाई वाले अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं.........लेकिन बात सोचने की तो यह भी है कि हम आखिर क्या कर रहे हैं !!---मुझे पूरा विश्वास है कि अगर हर घर के द्वार पर भी एक सफाईवाला खड़ा कर दिया जाये...तो भी हमारी हालत में सुधार नहीं हो सकता।

और इस तरह की गंदगी जो हमें जगह जगह दिखने लगी है उस का सब से अहम् कारण जो मुझे लगता है कि हमारा लाइफ-स्टाइल कुछ इस तरह का हो गया है कि हम बहुत ज़्यादा कूड़ा-कर्कट जनरेट करने लग गये हैं.............आप को भी याद होगा कि जब हम लोग बच्चे थे तो सारे घर की सफाई होने के बाद जो धूल-मिट्टी इक्ट्ठी हुया करती थी, उसे काम-वाली एक कागज़ पर डाल कर बाहर दरवाजे के बाहर फैंक आती थी और उन दिनों भी इस तरह के बिहेवियर पर बड़ी आपत्ति उठाई जाती थी कि यार, यह भी कोई बार हुई कि गंदगी को मुंह से उतार कर नाक पर लगा लिया.......घर की सफाई कर के सारी गंदगी बाहर डाल दी , यह भी कोई बात हुई !

लेकिन अब तो हम अपने आप को विकसित कह कर खुश होने वाले लोग...कुछ ज्यादा ही उच्चश्रृंखल से हो गये हैं। एक घर का कूड़ा-कर्कट देख कर डर लगता है................किसी के घर का ही क्यों ....मुझे तो अपने घर का ही दैनिक कूडा देख कर हैरानगी होती है कि यार, हम लोग एक दिन में इतना खा जाते हैं....दो-तीन थैलियां रोज़ाना कूड़ा। खैर, हमारे यहां तो नहीं , लेकिन आम तौर पर इस कूड़े में बच्चों के चिप्सों के पैकेट , उन की मनपसंद चीज़ों के पैकेट इत्यादि भी बहुत मात्रा में मिलते हैं....और दुःख की बात तो यही है कि ये उत्पाद हमारे बच्चों की सेहत बिगाड़ने के बाद भी हमारे पर्यावरण को भी विध्वंस करने में नहीं चूकते क्योंकि ये टोटली नान-बायो-डिग्रेडेबल होते हैं।

वैसे जिस तरह से मैं अपनी चारों तरफ़ रोज़ाना बड़े बड़े नाले इन प्लास्टिक की थैलियों की वजह से चोक हुये देखता हूं ना ...इस से मुझे तो लगता है कि आज की ताऱीख में ये थैलियां हमारी बहुत बड़ी शत्रु हैं.........कईं जगह इन पर बैन लगा है लेकिन फिर मैं और आप जब भी इसे मांगते हैं , हमें तुरंत एक थमा ही दी जाती है................यार, दही, दूध, दाल, सब्जी तक इन घटिया किस्म की थैलियों में मिलने लगी है। इन सस्ती थैलियों में लाई गई खाने पीने की वस्तुयें खा कर हम बीमारियों को तो खुला आमंत्रण दे ही रहे हैं ,उस के बाद ये हमारे नालीयां एवं नाले रोक कर सारे शहर में गंदगी फैलाती हैं। और कईं बार तो हमारे पशु-धन ( गऊ-माताओं वगैरह..) के पेट से इन के बंडल निकाले जा चुके हैं ..............हम सब के लिये कितनी शर्म की बात है कि हमें केवल एक कपड़े का थैला उठाने में इतनी झिझक हो रही है और पर्यावरण का जो मलिया-मेट हो रहा है , उसे हम देख नहीं पा रहे हैं या देख कर भी न देखने का ढोंग कर रहे हैं । और हर काम में सरकारी पहल की आस लगाये रहते हैं कि यार, काश हमारे शहर में भी इन चालू किस्म की पालिथिन की थैलियों पर बैन लग जाये........इस बैन में क्या है, आप आज से कपड़े का थैला उठा लीजिये , कसम खा लीजिये कि इन थैलियों को नहीं छूना..............तो बस हो गया बैन....................इस के लिये किसी कानून की ज़रूरत थोड़े ही है। लेकिन कुछ भी हो, अब तो यह सब करना ही होगा .....ऩहीं तो ये मच्छर हमें परेशान करते रहेंगे, गंदगी के अंबार हमारे आस-पास लगते रहेंगे.......और जैसा कि वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइज़ेशन कह रही है कि आज कल नईं नईं बीमारियों दिखने लगी हैं..................वे तो दिखेंगी ही क्योंकि हम लोगों ने निराले निराले शौक पाल रखे हैं ।

लेकिन जो भी हो, इन पालीथिन की थैलियों को बाय-बाय कह ही दिया जाये..............इसी में ही हम सब की बेहतरी है....बेहतरी को मारो गोली............अब तो वह स्टेज रही ही नहीं, अब तो भई इन को बहिष्कार करने के इलावा कोई चारा ही नहीं बचा। और अगर अभी भी मन को समझा न पायें हों तो जब कोई सफाई-कर्मचारी बिना दस्ताने डाले हुये किसी रुके हुये मेन-होल की सफाई कर रहा हो तो थोड़ा उस के पास खड़े होकर अगर हम उस में निकलते हुये तरह तरह के आधुनिकता के , विकास के प्रतीकों को ...और उस के द्वारा लगातार बाहर निकाल कर रखे जा रहे इन्हीं थैलियों के ढेर को देखेंगे तो सारा माजरा समझ में आ जायेगा। लेकिन कितने दिन यह सब ठीक रहेगा..............बस, चंद दिनों के लिये ही ।

चलिये......थोडा सोचें कि आखिर हम ने इस विकास से क्या पाया.......ठीक है फोन पर ढेर बतियाने लगे हैं, घर में ही रेल टिकट निकालने लगे हैं, हवाई जहाज में उड़ने के बारे में घर बैठे ही जानने लगे हैं , चंद मिनट पहले दूर- देश में क्या हुया है जानने लगे हैं, स्टिंग आप्रेशन भी करने लगे हैं..............लेकिन इस मच्छर का भी तो कुछ करो ना यारो। बहुत परेशानी होती है.....चिल्लाने की इच्छा होती है।

वही बात है ना कि जैसे जावेद अख्तर साहब लिखते हैं कि पंछी नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके, .......तुमने और मैंने क्या पाया इंसा होके !!................कितना उम्दा एक्सप्रेशन है...............वाह भई वाह!!..........लेकिन हम भी तो हम ही ठहरे, अपनी तरह के एक अदद अलग ही पीस, हम ये सब बातें सुन कर भी कहां सुधरने वाले हैं।.....मैं कोई झूठ बोल्या ?...........



8 comments:

Gyandutt Pandey said...

पॉलीथीन तो बहुत बड़ा अभिशाप है। एक बड़ी खोज वह होगी जिसमें पॉलीथीन को बायोडिग्रेडेबल बनाया जा सकेगा। वह अनुसन्धान कर्ता या तो कुनैन/पेनिसिलीन के आविष्कारक की तरह मानवता का सेवक होगा, या बिल गेट्स की तरह सबसे धनी।
उस आविष्कारक की इन्तजार में है यह दुनियां।

दिनेशराय द्विवेदी said...

गंदगी लोगों को ग्राह्य होती जा रही है।

डॉ. अजीत कुमार said...

पता नहीं ब्लोग पढने वाले कितने लोग इस बात की चिंता करते होंगे? या कितने आदमी इस पर अमल करते होंगे...

mamta said...

गंदगी और पॉलीथीन की समस्या जटिल ही होती जा रही है।
गोवा मे सब्जी या फल वाले पॉलीथीन नही देते है क्यूंकि यहां पॉलीथीन मे सामान देने पर दुकानदार को जुर्माना देना पड़ता है।
हालांकि अभी ये पूरी तरह सफल नही है ।

परमजीत बाली said...

बहुत गंभीर मसला है...लेकिन अभी बचाव का कोई रास्ता नजर नही आता।

" मैं कोई झूठ बोल्या?"
कोई ना।

Mired Mirage said...

मैं तो बार बार पॉलीथीन की थेली लेने से मना करती हूँ । सब्जी आदि खरीदने जाती हूँ तो अपनी अलग अलग थैलियों में सब्जी डलवाती हूँ । सब्जी वाले व वालियाँ अवश्य मुझे किसी प्रकार का सनकी मानते हैं । एक रूपये में बिकते शैम्पू, पान मसाले आदि के पाऊच भी बहुत बड़ी समस्या हैं । परन्तु यदि इनके विरुद्ध बोलेंगे तो गरीब विरोधी कहलाएँगे ।
घुघूती बासूती

Padma Srivastava said...

डॉक्टर साहब, देश में गंदगी और पॉलीथीन की समस्या बढ़ती जा रही है।

नीरज गोस्वामी said...

आप सच कह रहे हैं, बचपन में हम लोग घर की लान में चारपाई की एक श्रृंखला बना कर गर्मियों में सोया करते थे और मच्छर का नमो निशान नहीं हुआ करता था अब तो लान क्या छत पर सोये कई दशक हो गए...हम ही अपने इस हाल के लिए जिम्मेदार हैं.
नीरज